MP TET -भाग ब राजनीति विज्ञान ( Political Science) नोट्स भाग -1

भाग-ब: राजनीति विज्ञान (Political Science)

(मुख्य चयन विषय पाठ्यक्रम – कुल अंक: 120)

  • राजनीति विज्ञान का परिचय: परिभाषा, प्रकृति व क्षेत्र, राजनीति के राजनीतिक सिद्धान्त (परम्परावादी व आधुनिक) तथा अन्य विषयों से संबंध।
  • शक्ति एवं अधिकार: शक्ति एवं अधिकार की अवधारणा, राज्य की उत्पत्ति, साम्राज्यवाद और इसकी बहुलवादी आलोचना।
  • नागरिक अधिकार व स्वतंत्रता: मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य, राज्य के नीति निर्देशक तत्व, मानव अधिकार, स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय।
  • प्रजातंत्र व शासन के अंग: प्रजातंत्र का अर्थ, प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त, विकास एवं कल्याणकारी राज्य; व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका तथा शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त।
  • संविधान व शासन प्रणालियाँ: संविधान का अर्थ, संविधान के स्रोत, संविधान के प्रकार; संसदीय एवं अध्यक्षीय शासन प्रणाली, एकात्मक व संघीय शासन प्रणाली; दलीय पद्धति और दबाव समूह।
  • भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन: भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का संक्षिप्त इतिहास।
  • निर्वाचन आयोग: निर्वाचन आयोग (Election Commission) की संरचना व कार्य।
  • संघीय शासन व्यवस्था: संघीय शासन का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएँ; राष्ट्रपति, संसद, कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री तथा सर्वोच्च न्यायालय।
  • राज्य शासन व्यवस्था: राज्यपाल, विधान परिषद, विधानसभा, कर्तव्य, मंत्रिपरिषद और मुख्यमंत्री; केन्द्र व राज्य संबंध।
  • राजनीतिक दल एवं मुख्य मुद्दे: राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दल; भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे – जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता और गरीबी।
  • राजनैतिक चिंतन का स्वरूप (Political Thoughts):
    • भारतीय राजनीतिक विचारक: कौटिल्य, राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, लोकमान्य तिलक।
    • पाश्चात्य राजनैतिक चिंतक: सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, रूसो, मेकयावली।
  • राजनैतिक विचारधाराएं: उदारवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद और गांधीवाद।
  • विश्व की महत्वपूर्ण शासन प्रणालियाँ:
    • ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) व स्विटजरलैण्ड की शासन प्रणाली।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका तथा स्विटजरलैण्ड के संविधान संशोधन प्रक्रिया का तुलनात्मक अध्ययन।
  • भारत एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध:
    • विश्व राजनीति में भारत की स्थिति तथा भारत का अन्य राष्ट्रों से संबंध।
    • भारत की विदेश नीति – सिद्धान्त, उद्देश्य, तत्व एवं उनकी समस्याएँ।
    • संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO) – कार्यप्रणाली, निशस्त्रीकरण और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ।
    • भारत तथा संयुक्त राष्ट्र, भारत तथा दक्षेस (SAARC), भारत तथा आसियान (ASEAN), भारत तथा यूरोपीय साझा व्यापार।
    • वैश्वीकरण एवं निशस्त्रीकरण।
  • लोक प्रशासन (Public Administration):
    • अर्थ, प्रकृति एवं क्षेत्र; लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन में अन्तर तथा लोक प्रशासन की अध्ययन पद्धतियाँ।
    • केन्द्रीयकरण एवं विकेन्द्रीकरण तथा शक्ति का हस्तांतरण।
    • कार्मिक प्रशासन – भर्ती, पदोन्नति, प्रशिक्षण तथा संघीय लोक सेवा आयोग (UPSC)।
    • वित्तीय प्रशासन – बजट और भारत में बजट निर्माण की प्रक्रिया।
    • विकास प्रशासन – नौकरशाही की प्रकृति एवं कार्य।
    • लोकपाल एवं लोकायुक्त।

संक्षिप्त नोटस –

राजनीति विज्ञान का परिचय: परिभाषा, प्रकृति व क्षेत्र

  • परिभाषा: राजनीति विज्ञान वह सामाजिक विज्ञान है जो राज्य, सरकार, राजनीतिक संस्थाओं और मानवीय राजनीतिक व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन करता है। गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का प्रारंभ और अंत राज्य के साथ होता है।” [1]
  • प्रकृति: इसकी प्रकृति को लेकर विद्वानों में मतभेद है; जहाँ परम्परावादी इसे एक कला मानते हैं, वहीं आधुनिक विचारक वैज्ञानिक पद्धतियों के प्रयोग के कारण इसे एक विज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं।
  • क्षेत्र: इसके क्षेत्र के अंतर्गत राज्य का भूत, वर्तमान और भविष्य, सरकार के अंग, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीतिक विचारधाराएँ और मानव के राजनीतिक जीवन का व्यापक अध्ययन शामिल है।

राजनीति के राजनीतिक सिद्धान्त (परम्परावादी व आधुनिक)

  • परम्परावादी सिद्धान्त: यह सिद्धान्त मुख्य रूप से मूल्यों, आदर्शों, दर्शन और कानूनी-संस्थागत ढाँचे के अध्ययन पर बल देता है। यह इस बात पर विचार करता है कि “राज्य को कैसा होना चाहिए” और इसकी पद्धति मुख्य रूप से वर्णनात्मक और दार्शनिक है।
  • आधुनिक सिद्धान्त: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरा यह सिद्धान्त तथ्यों, व्यावहारिक व्यवहार और वैज्ञानिक पद्धतियों पर जोर देता है। इसके तहत व्यवहारवाद और उत्तर-व्यवहारवाद के माध्यम से राजनीतिक घटनाओं का यथार्थवादी और निष्पक्ष विश्लेषण किया जाता है।

अन्य विषयों से संबंध

  • इतिहास से संबंध: इतिहास राजनीति विज्ञान को अध्ययन के लिए आवश्यक सामग्री और पृष्ठभूमि प्रदान करता है, जिससे राजनीतिज्ञ अतीत की गलतियों से सीख सकते हैं। सीले के शब्दों में, “राजनीति के बिना इतिहास निष्फल है और इतिहास के बिना राजनीति निराधार है।”
  • अर्थशास्त्र से संबंध: राज्य की नीतियां और आर्थिक व्यवस्थाएं एक-दूसरे पर गहराई से निर्भर हैं, क्योंकि आर्थिक खुशहाली के बिना राजनीतिक स्थिरता संभव नहीं है।
  • समाजशास्त्र से संबंध: समाजशास्त्र सभी सामाजिक विज्ञानों की जननी है, जो राजनीति विज्ञान को मानवीय सामाजिक अंतःक्रियाओं और सामाजिक संरचनाओं को समझने का आधार प्रदान करता है।

शक्ति एवं अधिकार की अवधारणा

  • शक्ति (Power): राजनीति विज्ञान में शक्ति का अर्थ दूसरों के व्यवहार, निर्णयों और कार्यों को अपनी इच्छानुसार प्रभावित या नियंत्रित करने की क्षमता से है। रॉबर्ट डहल के अनुसार, “A की शक्ति उस सीमा तक कही जा सकती है जिस सीमा तक वह B से वह कार्य करा सके जो B अन्यथा नहीं करता।”
  • अधिकार/सत्ता (Authority): जब शक्ति को कानूनी और नैतिक रूप से समाज द्वारा मान्यता या वैधता (Legitimacy) मिल जाती है, तो वह अधिकार या सत्ता बन जाती है। सरल शब्दों में, “शक्ति + वैधता = अधिकार।”

राज्य की उत्पत्ति

  • परिचय: राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, इसे समझाने के लिए कई सिद्धान्त दिए गए हैं, जिनमें दैवीय उत्पत्ति, शक्ति सिद्धान्त और सामाजिक समझौते का सिद्धान्त प्रमुख हैं।
  • आधुनिक मत: वर्तमान में ऐतिहासिक या विकासवादी सिद्धान्त को सबसे प्रामाणिक माना जाता है, जिसके अनुसार राज्य किसी एक दिन की रचना नहीं बल्कि सदियों के क्रमिक विकास का परिणाम है।

साम्राज्यवाद और इसकी बहुलवादी आलोचना

बहुलवादी आलोचना: बहुलवादी विचारक राज्य की संप्रभुता को असीमित नहीं मानते। वे साम्राज्यवाद की आलोचना करते हुए तर्क देते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में सभी राज्यों और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों को स्वायत्तता व समान अधिकार मिलने चाहिए, न कि किसी एक शक्ति का वर्चस्व।

साम्राज्यवाद: जब कोई शक्तिशाली देश अपनी सीमाओं से बाहर जाकर किसी कमजोर देश पर बलपूर्वक अपना राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य नियंत्रण स्थापित करता है, तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं।

नागरिक अधिकार व स्वतंत्रता

  • मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य: मौलिक अधिकार नागरिकों के चौमुखी विकास और गरिमा के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त वे बुनियादी अधिकार हैं जिन्हें न्यायालय का संरक्षण प्राप्त है। वहीं, मौलिक कर्तव्य नागरिकों के वे नैतिक और सामाजिक दायित्व हैं जो राष्ट्र की एकता, अखंडता और प्रगति को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
  • राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP): ये राज्यों (सरकारों) को संविधान द्वारा दिए गए सकारात्मक निर्देश और नीतिगत मार्गदर्शन हैं, जिनका उद्देश्य लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। यद्यपि ये न्यायालय द्वारा बाध्यकारी नहीं हैं, फिर भी देश के शासन और कानून निर्माण में इन्हें मूलभूत माना गया है।
  • मानव अधिकार: मानव अधिकार वे प्राकृतिक और सार्वभौमिक अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को केवल इंसान होने के नाते, बिना किसी भेदभाव (जाति, लिंग, धर्म या राष्ट्रीयता) के प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों की वैश्विक स्वीकार्यता 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) से सुदृढ़ हुई।
  • स्वतंत्रता (Liberty): राजनीति विज्ञान में स्वतंत्रता का अर्थ केवल बंधनों का अभाव नहीं है, बल्कि व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए उचित अवसर और अनुकूल वातावरण मिलना है। इसे सकारात्मक (राज्य के उचित नियमन सहित) और नकारात्मक (राज्य के हस्तक्षेप का पूर्ण अभाव) दो रूपों में समझा जाता है।
  • समानता (Equality): समानता का तात्पर्य समाज में विशेषाधिकारों की समाप्ति और सभी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर प्रदान करने से है। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर नागरिक को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने के समान अधिकार मिलें।
  • न्याय (Justice): न्याय एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का नाम है जहाँ व्यक्तिगत अधिकारों और सामाजिक भलाई के बीच उचित संतुलन स्थापित किया जाता है। आधुनिक संदर्भ में न्याय के तीन मुख्य आयाम हैं—राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक न्याय, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक अधिकारों की पहुँच सुनिश्चित करते हैं।

प्रजातंत्र व शासन के अंग

  • प्रजातंत्र का अर्थ: प्रजातंत्र (लोकतंत्र) शासन की वह प्रणाली है जहाँ सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित होती है और शासन का संचालन जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से होता है। अब्राहम लिंकन के शब्दों में, “यह जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा शासन है।”
  • प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त: ये वे नियम और प्रणालियाँ हैं जिनके माध्यम से जनता की इच्छा को सरकार तक पहुँचाया जाता है, जैसे प्रादेशिक प्रतिनिधित्व, आनुपातिक प्रतिनिधित्व और कार्यात्मक प्रतिनिधित्व। यह तय करता है कि चुनाव और विधायिका में समाज के विभिन्न वर्गों को किस प्रकार और किस अनुपात में स्थान मिलेगा।
  • विकास एवं कल्याणकारी राज्य: कल्याणकारी राज्य वह व्यवस्था है जहाँ सरकार का मुख्य कार्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि नागरिकों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी जरूरतें पूरी करना होता है। यह राज्य को शोषक संस्था के बजाय एक सकारात्मक और सहयोगी सामाजिक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
  • व्यवस्थापिका (Legislature): यह शासन का वह अंग है जिसका मुख्य कार्य देश के लिए कानूनों का निर्माण करना, नीतियों को स्वीकृति देना और बजट पारित करना होता है। भारत में संसद (लोकसभा और राज्यसभा) और राज्यों में विधानमंडल व्यवस्थापिका के उदाहरण हैं।
  • कार्यपालिका (Executive): कार्यपालिका शासन का वह व्यावहारिक अंग है जो व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों और नीतियों को देश में लागू करने का कार्य करता है। इसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद (राजनीतिक कार्यपालिका) के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी और नौकरशाही (स्थायी कार्यपालिका) शामिल होते हैं।
  • न्यायपालिका (Judiciary): न्यायपालिका शासन का वह स्वतंत्र अंग है जो कानूनों की व्याख्या करती है, संविधान की रक्षा करती है और विवादों का निपटारा करती है। इसका मुख्य उत्तरदायित्व नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना और व्यवस्थापिका व कार्यपालिका के कार्यों की संवैधानिकता की जाँच करना है।
  • शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त: फ्रांस के विचारक मॉन्टेस्क्यू द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त के अनुसार, शासन के तीनों अंगों (व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) के कार्य और शक्तियाँ अलग-अलग होनी चाहिए। इसका उद्देश्य किसी एक अंग के पास शक्तियों का संकेंद्रण रोकना है ताकि नागरिकों की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और सरकार निरंकुश न हो।

संविधान व शासन प्रणालियाँ

  • संविधान का अर्थ: संविधान किसी भी देश का सर्वोच्च और बुनियादी कानूनी दस्तावेज होता है, जिसके अनुसार उस देश की शासन व्यवस्था का संचालन किया जाता है। यह सरकार के विभिन्न अंगों की शक्तियों, उनके आपसी संबंधों और नागरिकों के अधिकारों की सीमाओं को तय करता है।
  • संविधान के स्रोत: संविधान के स्रोत से तात्पर्य उन ऐतिहासिक दस्तावेजों, वैधानिक परंपराओं, विदेशी संविधानों और न्यायिक निर्णयों से है जिनसे किसी देश के संविधान का ढाँचा तैयार होता है। उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान ने संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से और मौलिक अधिकार अमेरिका के संविधान से प्रेरित होकर अपनाए हैं।
  • संविधान के प्रकार: संविधान मुख्यतः लिखित (जैसे अमेरिका और भारत) व अलिखित (जैसे ब्रिटेन) तथा नम्य/लचीला (आसानी से संशोधन योग्य) व अनम्य/कठोर (विशेष प्रक्रिया से संशोधन योग्य) श्रेणियों में विभाजित किए जाते हैं। यह वर्गीकरण संविधान की निर्माण प्रक्रिया और उसकी संशोधन पद्धति पर निर्भर करता है।
  • संसदीय एवं अध्यक्षीय शासन प्रणाली: संसदीय प्रणाली (जैसे भारत, ब्रिटेन) में कार्यपालिका अपनी शक्तियों के लिए व्यवस्थापिका (संसद) के प्रति उत्तरदायी होती है और यहाँ राष्ट्रपति/राजा नाममात्र का और प्रधानमंत्री वास्तविक प्रधान होता है। इसके विपरीत, अध्यक्षीय प्रणाली (जैसे अमेरिका) में कार्यपालिका विधायिका से स्वतंत्र होती है और राष्ट्रपति ही राज्य व सरकार दोनों का वास्तविक प्रमुख होता है।
  • एकात्मक व संघीय शासन प्रणाली: एकात्मक प्रणाली में शासन की समस्त शक्तियाँ एक केंद्रीय सरकार में निहित होती हैं और प्रांतीय सरकारें उसके अधीन कार्य करती हैं (जैसे ब्रिटेन)। जबकि संघीय प्रणाली में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच संविधान द्वारा किया जाता है, जहाँ दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वायत्त होती हैं (जैसे अमेरिका, कनाडा)।
  • दलीय पद्धति: लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दलों की व्यवस्था को दलीय पद्धति कहते हैं, जो मुख्यतः तीन प्रकार की होती है: एक-दलीय (जैसे चीन), द्विदलीय (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन) और बहु-दलीय पद्धति (जैसे भारत)। यह व्यवस्था तय करती है कि देश की राजनीति में विचारधाराओं और सत्ता की प्रतिस्पर्धा का स्वरूप कैसा होगा।
  • दबाव समूह (Pressure Groups): दबाव समूह समान हितों वाले व्यक्तियों के वे गैर-राजनीतिक संगठन होते हैं जो स्वयं चुनाव नहीं लड़ते, बल्कि सरकार पर दबाव बनाकर अपने हितों के अनुकूल नीतियां बनवाने का प्रयास करते हैं। व्यावसायिक संगठन, छात्र संघ और किसान संगठन इसके प्रमुख उदाहरण हैं जो लोकतंत्र में जनता की आवाज को नीति-निर्माताओं तक पहुँचाते हैं।

नोट्स –

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन

  • संक्षिप्त इतिहास: भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन मुख्य रूप से 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से शुरू होकर 1947 में देश की आजादी तक चला एक व्यापक जन-आन्दोलन था। इसे तीन प्रमुख चरणों में बांटा जाता है: उदारवादी चरण (1885-1905) जिसमें संवैधानिक सुधारों की मांग थी, उग्रवादी चरण (1905-1919) जिसने स्वदेशी और पूर्ण स्वराज पर बल दिया, और गांधीवादी चरण (1919-1947) जिसमें असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों के जरिए देश को स्वतंत्रता दिलाई गई।

निर्वाचन आयोग (Election Commission)

  • संरचना: भारत का निर्वाचन आयोग एक स्थायी और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जिसका उल्लेख संविधान के भाग 15 (अनुच्छेद 324-329) में है। वर्तमान में यह एक त्रिसदस्यीय निकाय है, जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त (EC) होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • कार्य: निर्वाचन आयोग का मुख्य कार्य देश में संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों का निष्पक्ष संचालन, नियंत्रण और अधीक्षण करना है। इसके साथ ही यह मतदाता सूचियां तैयार करना, राजनीतिक दलों को मान्यता देना, उन्हें चुनाव चिह्न आवंटित करना और आदर्श आचार संहिता लागू करने का काम करता है।

संघीय शासन व्यवस्था

  • अर्थ एवं परिभाषा: संघीय शासन (Federalism) वह राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें सत्ता का विभाजन एक केंद्रीय सरकार और उसकी विभिन्न प्रांतीय या क्षेत्रीय इकाइयों के बीच होता है। के. सी. व्हीयर के अनुसार, “संघीय सिद्धांत का अर्थ शक्तियों का ऐसा विभाजन है जिसमें सामान्य (केंद्र) और क्षेत्रीय (राज्य) सरकारें अपने-अपने क्षेत्रों में एक-दूसरे से स्वतंत्र और समन्वयकारी होती हैं।”
  • विशेषताएँ: संघीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं में लिखित और सर्वोच्च संविधान, केंद्र व राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन (सूचियों के माध्यम से), एक स्वतंत्र न्यायपालिका (जो विवादों का निपटारा करे) और द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका शामिल हैं।
  • राष्ट्रपति: राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक और राज्य का संवैधानिक प्रधान होता है, जिसमें संघ की कार्यपालिका शक्तियां निहित होती हैं। इनका चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है और ये मुख्य रूप से कैबिनेट की सलाह पर काम करते हैं।
  • संसद: भारत की संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है, जो राष्ट्रपति, लोकसभा (निचला सदन/जनता का सदन) और राज्यसभा (उच्च सदन/राज्यों की परिषद) से मिलकर बनती है। इसका मुख्य कार्य देश के लिए कानूनों का निर्माण करना और कार्यपालिका पर नियंत्रण रखना है।
  • कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री: प्रधानमंत्री देश का वास्तविक प्रशासनिक प्रमुख होता है, जो लोकसभा में बहुमत दल का नेता होता है। कैबिनेट (मंत्रिमंडल) प्रधानमंत्री के नेतृत्व में निर्णय लेने वाली सर्वोच्च नीति-निर्माता संस्था होती है, जिसके पास सरकार के सभी महत्वपूर्ण विभागों का प्रभार होता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय: सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) भारत की एकीकृत न्यायपालिका का शीर्ष न्यायालय है, जो नई दिल्ली में स्थित है। यह संविधान का अंतिम व्याख्याकार, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का रक्षक और केंद्र-राज्य विवादों को सुलझाने वाली सर्वोच्च संस्था है।

राज्य शासन व्यवस्था

  • राज्यपाल: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्य की सभी कार्यपालिका कार्रवाइयां राज्यपाल के नाम से ही की जाती हैं, और वे मुख्यमंत्री की सलाह पर कार्य करते हैं।
  • विधान परिषद: विधान परिषद (Legislative Council) राज्य विधानमंडल का उच्च और स्थायी सदन होता है, जो भारत के केवल कुछ ही राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र आदि) में अस्तित्व में है। इसके सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है और इसे कभी भंग नहीं किया जा सकता।
  • विधानसभा: विधानसभा (Legislative Assembly) राज्य विधानमंडल का निम्न और लोकप्रिय सदन होता है, जिसके सदस्यों (विधायकों/MLAs) का चुनाव राज्य की जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से किया जाता है। राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने और बजट पारित करने में विधानसभा के पास वास्तविक शक्तियां होती हैं।
  • कर्तव्य, मंत्रिपरिषद और मुख्यमंत्री: मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक प्रशासनिक प्रधान होता है, जिसका मुख्य कर्तव्य राज्य के शासन की जानकारी राज्यपाल तक पहुँचाना और मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करना है। मंत्रिपरिषद मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य के नीति-निर्धारण और प्रशासनिक निर्णयों के लिए सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
  • केन्द्र व राज्य संबंध: भारतीय संविधान के भाग 11 और 12 में केंद्र और राज्यों के संबंधों को तीन भागों में स्पष्ट किया गया है: विधायी संबंध, प्रशासनिक संबंध और वित्तीय संबंध। इन संबंधों को सुचारू रूप से चलाने के लिए सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से शक्तियों का बंटवारा किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय हित में केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है।

राजनीतिक दल एवं मुख्य मुद्दे

  • राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दल: राष्ट्रीय दल वे राजनीतिक दल होते हैं जिनका प्रभाव पूरे देश या कई राज्यों में होता है और जो निर्वाचन आयोग द्वारा तय कड़े चुनावी मानकों (जैसे निश्चित प्रतिशत में वोट या सीटें पाना) को पूरा करते हैं (जैसे BJP, INC, AAP)। क्षेत्रीय दल वे होते हैं जिनका आधार और प्रभाव किसी एक या कुछ विशेष राज्यों तक सीमित होता है और वे स्थानीय या क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं (जैसे DMK, TMC, SP)।
  • जाति और धर्म (मुख्य मुद्दे): भारतीय राजनीति में जाति एक बड़ा कारक है, जहाँ टिकटों का बंटवारा और मतदान का व्यवहार अक्सर जातीय समीकरणों के आधार पर तय होता है। इसी तरह, धर्म आधारित ध्रुवीकरण, तुष्टिकरण की राजनीति और पंथनिरपेक्षता (Secularism) को लेकर होने वाली बहसें चुनावी विमर्श को गहराई से प्रभावित करती हैं।
  • भाषा और क्षेत्रीयता (मुख्य मुद्दे): भाषाई अस्मिता को लेकर राज्यों के पुनर्गठन और हिंदी के प्रसार को लेकर विवाद उठते रहे हैं। वहीं क्षेत्रीयता की भावना के कारण अपने क्षेत्र के विकास की मांग, क्षेत्रीय असंतुलन और अलग राज्यों की मांग (जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में) राजनीति के केंद्र में बनी रहती है।
  • गरीबी (मुख्य मुद्दे): गरीबी और आर्थिक असमानता भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। सरकार की कल्याणकारी नीतियां, मुफ्त राशन, रोजगार गारंटी योजनाएं (जैसे मनरेगा) और सब्सिडी जैसी योजनाएं चुनावों में जीत-हार और राजनीतिक दलों के एजेंडे को तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

Notes-

भारतीय राजनीतिक विचारक

कौटिल्य: कौटिल्य (चाणक्य) प्राचीन भारत के महान कूटनीतिज्ञ और राजनीतिशास्त्री थे, जिन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ ग्रंथ की रचना की और राज्य का ‘सप्तांग सिद्धान्त’ (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड, मित्र) प्रतिपादित किया। उन्होंने राज्य की सुरक्षा और विस्तार के लिए साम, दाम, दंड, भेद और ‘मण्डल सिद्धान्त’ (विदेश नीति) का व्यावहारिक दर्शन दिया।


राजा राममोहन राय: इन्हें ‘आधुनिक भारत का जनक’ और ‘भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत’ कहा जाता है, जिन्होंने सती प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ सफल आंदोलन चलाया। राजनीतिक क्षेत्र में उन्होंने नागरिक स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और पाश्चात्य शिक्षा व वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पुरजोर समर्थन किया।


दयानंद सरस्वती: आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया और स्वदेशी, स्वधर्म व ‘स्वराज’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। उनका राजनीतिक चिंतन राष्ट्रवाद, स्वदेशी शासन की श्रेष्ठता और सामाजिक समानता (विशेषकर जातिवाद के विरोध) पर आधारित था।


महात्मा गांधी: गांधीजी का राजनीतिक दर्शन सत्य, अहिंसा और ‘सत्याग्रह’ (सत्य के लिए आग्रह) पर टिका है, जिसके बल पर उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी। उन्होंने राज्यविहीन लोकतंत्र (रामराज्य) की कल्पना की और शक्तियों के विकेंद्रीकरण के लिए ‘पंचायती राज’ व आर्थिक समानता के लिए ‘ट्रस्टीशिप (न्यासिता) का सिद्धान्त’ दिया।


डॉ. बी. आर. अम्बेडकर: भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. अम्बेडकर एक महान समाज सुधारक और राजनीतिक चिंतक थे, जिन्होंने दलितों, महिलाओं और वंचितों के अधिकारों के लिए सामाजिक लोकतंत्र की वकालत की। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक समाज में समानता और बंधुत्व (Social Justice) स्थापित न हो।


लोकमान्य तिलक: तिलक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उग्र राष्ट्रवाद के प्रमुख नेता थे, जिन्होंने “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” का ऐतिहासिक नारा दिया। उन्होंने जनता में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए ‘केसरी’ और ‘मराठा’ समाचार पत्रों तथा गणेश उत्सव व शिवाजी उत्सव जैसे सांस्कृतिक माध्यमों का प्रयोग किया।


पाश्चात्य राजनैतिक चिंतक

सुकरात (Socrates): सुकरात पाश्चात्य दर्शन के आधारस्तंभ थे, जिन्होंने द्वन्द्वात्मक पद्धति (प्रश्न-उत्तर शैली) के माध्यम से ‘ज्ञान ही सद्गुण है’ का सिद्धान्त दिया। उन्होंने तत्कालीन एथेंस की लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और अज्ञानता की तीखी आलोचना की, जिसके कारण उन्हें जहर का प्याला पीना पड़ा।


प्लेटो (Plato): सुकरात के शिष्य प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द रिपब्लिक’ में एक आदर्श राज्य और ‘दार्शनिक राजा के शासन’ (Philosopher King) की परिकल्पना की। उन्होंने समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए न्याय का सिद्धान्त और अभिभावक वर्ग (शासक व सैनिक) के लिए ‘साम्यवाद’ (सम्पत्ति और परिवार का त्याग) का प्रतिपादन किया।


अरस्तु (Aristotle): प्लेटो के शिष्य अरस्तु को ‘राजनीति विज्ञान का जनक’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने 158 संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन कर ‘पॉलिटिक्स’ नामक ग्रंथ लिखा। उन्होंने राज्य को एक प्राकृतिक संस्था माना, नागरिकता व दास प्रथा पर विचार दिए और क्रांति के कारणों व उन्हें रोकने के उपायों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया।


रूसो (Rousseau): फ्रांस के इस विचारक ने अपने ‘सामाजिक समझौते के सिद्धान्त’ (Social Contract) के माध्यम से लोकप्रिय संप्रभुता की नींव रखी। रूसो ने “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है” का नारा दिया और शासन का आधार ‘सामान्य इच्छा’ (General Will) को माना।


मेकयावली (Machiavelli): इटली के इस विचारक को ‘आधुनिक राजनीतिक चिंतन का जनक’ कहा जाता है, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘द प्रिंस’ में राजनीति को धर्म और नैतिकता से पूरी तरह अलग कर दिया। उन्होंने शासक को राज्य की रक्षा के लिए शेर जैसा बहादुर और लोमड़ी जैसा चालाक होने की सलाह दी।


राजनैतिक विचारधाराएं

  • उदारवाद (Liberalism): यह विचारधारा व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के शासन, निजी संपत्ति और सीमित सरकारी हस्तक्षेप पर बल देती है। इसके पारंपरिक रूप (जॉन लॉक) ने राज्य को एक ‘आवश्यक बुराई’ माना, जबकि आधुनिक उदारवाद ने जन-कल्याण के लिए राज्य की सकारात्मक भूमिका को स्वीकार किया।
  • समाजवाद (Socialism): समाजवाद एक ऐसी आर्थिक-राजनीतिक विचारधारा है जो उत्पादन और वितरण के साधनों पर निजी स्वामित्व के बजाय समाज या राज्य के नियंत्रण की वकालत करती है। इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक असमानता को समाप्त करना और समाज के कमजोर वर्गों का कल्याण सुनिश्चित करना है।
  • मार्क्सवाद (Marxism): कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित यह उग्र सामाजिक-आर्थिक सिद्धान्त मानव इतिहास को ‘वर्ग संघर्ष’ (अमीर बनाम गरीब) का इतिहास मानता है। यह पूंजीवाद को समाप्त कर एक ‘वर्गविहीन और राज्यविहीन समाज’ (साम्यवाद) की स्थापना के लिए हिंसक क्रांति का समर्थन करता है।
  • गांधीवाद (Gandhism): महात्मा गांधी के विचारों पर आधारित यह विचारधारा राजनीति के आध्यात्मिकरण (नैतिकता और धर्म का समावेश) और साध्य व साधन की पवित्रता पर जोर देती है। यह हिंसक क्रांतियों के विपरीत हृदय परिवर्तन, कुटीर उद्योगों (खादी), और समाज के अंतिम व्यक्ति के उदय (सर्वोदय) का मार्ग दिखाती है।

विश्व की महत्वपूर्ण शासन प्रणालियाँ

  • ब्रिटेन की शासन प्रणाली: ब्रिटेन में एकात्मक शासन और ‘संसदीय सर्वोच्चता’ वाली संवैधानिक राजतंत्र व्यवस्था है, जहाँ राजा/रानी नाममात्र का और प्रधानमंत्री वास्तविक प्रमुख होता है। ब्रिटिश संविधान अलिखित और लचीला है, तथा यहाँ कानून का शासन (Rule of Law) और द्विदलीय पद्धति पाई जाती है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) की प्रणाली: अमेरिका में कठोर संघीय व्यवस्था और ‘अध्यक्षीय शासन प्रणाली’ लागू है, जहाँ राष्ट्रपति राज्य और सरकार दोनों का वास्तविक व शक्तिशाली प्रधान होता है। यहाँ लिखित व कठोर संविधान, न्यायपालिका की सर्वोच्चता (न्यायिक पुनरावलोकन) और शक्तियों के पृथक्करण के साथ ‘नियंत्रण एवं संतुलन’ का सिद्धान्त पाया जाता है।
  • स्विटजरलैण्ड की शासन प्रणाली: स्विटजरलैण्ड अपने ‘प्रत्यक्ष लोकतंत्र’ (Direct Democracy) के लिए विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ जनता जनमत संग्रह (Referendum) और आरंभक (Initiative) के माध्यम से सीधे कानूनों के निर्माण में भाग लेती है। यहाँ एक अनोखी ‘बहुल कार्यपालिका’ (Plural Executive) है, जिसमें 7 सदस्य होते हैं और सभी को समान शक्तियां प्राप्त होती हैं।

U.S.A. तथा स्विटजरलैण्ड के संविधान संशोधन प्रक्रिया का तुलनात्मक अध्ययन

तुलना का आधारसंयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.)स्विटजरलैण्ड
प्रक्रिया का स्वरूपअत्यंत जटिल और कठोर है; राज्यों की सहमति के बिना संशोधन असंभव है।कठोर लेकिन लचीली; इसमें जनता की सीधी भागीदारी (प्रत्यक्ष लोकतंत्र) शामिल है।
संशोधन की पहल (Initiative)केवल कांग्रेस (संसद) के 2/3 बहुमत या राज्यों के 2/3 प्रस्तावों द्वारा संभव है।संसद के अलावा 1 लाख नागरिक स्वयं हस्ताक्षर करके संशोधन का प्रस्ताव रख सकते हैं।
अंतिम स्वीकृति (Ratification)कुल 3/4 राज्यों की विधायिकाओं या विशेष सम्मेलनों की मंजूरी अनिवार्य है।जनमत संग्रह (Referendum) द्वारा देश की अधिकांश जनता और अधिकांश कैंटनों (राज्यों) की मंजूरी अनिवार्य है।
जनता की भूमिकाजनता की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती; प्रक्रिया प्रतिनिधियों के माध्यम से होती है।जनता ही अंतिम निर्णायक होती है; उनके बिना कोई संशोधन पास नहीं हो सकता।

नोट्स –

विश्व राजनीति में भारत की स्थिति तथा अन्य राष्ट्रों से संबंध

  • विश्व राजनीति में स्थिति: भारत वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में एक उभरती हुई महाशक्ति, प्रमुख आर्थिक केंद्र और ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की एक सशक्त आवाज के रूप में स्थापित है। अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के कारण भारत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
  • अन्य राष्ट्रों से संबंध: भारत पड़ोसी पहले (Neighbourhood First) और एक्ट ईस्ट (Act East) नीतियों के माध्यम से महाशक्तियों (जैसे अमेरिका, रूस) और पड़ोसियों के साथ संतुलित संबंध रखता है। जहाँ अमेरिका के साथ रणनीतिक व तकनीकी साझेदारी मजबूत हुई है, वहीं रूस के साथ पारंपरिक दोस्ती और चीन व पाकिस्तान के साथ सीमाई व सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

भारत की विदेश नीति – सिद्धान्त, उद्देश्य, तत्व एवं उनकी समस्याएँ

  • सिद्धान्त व उद्देश्य: भारतीय विदेश नीति के मूल सिद्धान्तों में गुटनिरपेक्षता (Strategic Autonomy/Non-Alignment), पंचशील (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व), सामरिक स्वायत्तता और आतंकवाद का विरोध शामिल हैं। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की संप्रभुता व अखंडता की रक्षा करना, तीव्र आर्थिक विकास के लिए शांतिपूर्ण बाहरी वातावरण तैयार करना और विश्व शांति को बढ़ावा देना है।
  • तत्व व समस्याएँ: इसके निर्धारक तत्वों में भारत की विशाल भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक आवश्यकताएँ प्रमुख हैं। वर्तमान में इसकी मुख्य समस्याओं में चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीतियां (जैसे स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स, सीमा विवाद), पाकिस्तान प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद, वैश्विक भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण (जैसे रूस-यूक्रेन व पश्चिम का तनाव) और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO) – कार्यप्रणाली, निशस्त्रीकरण और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ

  • कार्यप्रणाली: संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO) की कार्यप्रणाली इसके छह प्रमुख अंगों—विशेषकर महासभा (विश्व की लघु संसद) और सुरक्षा परिषद (विश्व का पुलिसमैन)—के माध्यम से संचालित होती है। इसका मुख्य कार्य अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा बनाए रखना, राष्ट्रों के बीच मित्रवत संबंधों को बढ़ावा देना और मानवाधिकारों की रक्षा करना है।
  • निशस्त्रीकरण: संयुक्त राष्ट्र परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए UNODA (UN Office for Disarmament Affairs) और विभिन्न संधियों के माध्यम से वैश्विक निशस्त्रीकरण (Disarmament) के प्रयासों का नेतृत्व करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ: इसके तत्वावधान और समन्वय में विश्व बैंक (World Bank) तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी संस्थाएँ वैश्विक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने, विकासशील देशों को ऋण देने और गरीबी उन्मूलन के लिए वित्तीय कार्यप्रणाली का संचालन करती हैं।

भारत तथा वैश्विक/क्षेत्रीय संगठन (UN, SAARC, ASEAN, EU)

  • भारत तथा संयुक्त राष्ट्र (UN): भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है और UN शांति सेना (Peacekeeping) में सबसे बड़ा योगदानकर्ताओं में से एक है। भारत वर्तमान में वैश्विक वास्तविकताओं को दर्शाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिए प्रबल दावेदारी पेश कर रहा है।
  • भारत तथा दक्षेस (SAARC): सार्क (SAARC) दक्षिण एशियाई देशों का क्षेत्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना में भारत की मुख्य भूमिका थी। हालांकि, पाकिस्तान के असहयोग और सीमा पार आतंकवाद के कारण यह संगठन वर्तमान में लगभग निष्क्रिय है, जिसके कारण भारत का ध्यान अब बिम्सटेक (BIMSTEC) पर अधिक केंद्रित हो गया है।
  • भारत तथा आसियान (ASEAN): दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का यह संगठन (ASEAN) भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ और हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) रणनीति का केंद्रीय स्तंभ है। भारत आसियान का एक रणनीतिक भागीदार है, जिसके साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और समुद्री सुरक्षा सहयोग अत्यंत मजबूत हैं।
  • भारत तथा यूरोपीय साझा व्यापार (EU): यूरोपीय संघ (EU) भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदारों और निवेशकों में से एक है। भारत और यूरोपीय संघ व्यापार, निवेश, जलवायु परिवर्तन और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप देने पर लगातार काम कर रहे हैं।

वैश्वीकरण एवं निशस्त्रीकरण

  • वैश्वीकरण (Globalization): यह विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी, तकनीक और विचारों के मुक्त प्रवाह व एकीकरण की प्रक्रिया है। इसने जहाँ एक ओर आर्थिक विकास, उन्नत तकनीक की पहुँच और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय उद्योगों को नुकसान, आर्थिक असमानता और संप्रभुता के समक्ष नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं।
  • निशस्त्रीकरण (Disarmament): इसका तात्पर्य विश्व में युद्धों को रोकने और शांति स्थापित करने के लिए घातक हथियारों (विशेषकर परमाणु हथियारों) के उत्पादन व भंडारण को कम या समाप्त करना है। भारत हमेशा से एक भेदभाव रहित, सार्वभौमिक और पूर्ण परमाणु निशस्त्रीकरण का समर्थक रहा है, लेकिन उसने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के कारण NPT और CTBT जैसी भेदभावपूर्ण संधियों पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

Notes-

लोक प्रशासन: अर्थ, प्रकृति एवं क्षेत्र

  • अर्थ: लोक प्रशासन सरकारी नीतियों को व्यावहारिक रूप देने, कानून को लागू करने और सार्वजनिक कार्यों का प्रबंधन करने वाली व्यवस्था है। वुड्रो विल्सन के शब्दों में, “कानून को विस्तृत और व्यवस्थित रूप से लागू करने का नाम ही लोक प्रशासन है।”
  • प्रकृति: इसकी प्रकृति को लेकर दो मुख्य दृष्टिकोण हैं—प्रबंधकीय दृष्टिकोण (केवल उच्च अधिकारियों के कार्यों को प्रशासन मानना) और एकीकृत दृष्टिकोण (चपरासी से लेकर सचिव तक के सभी कार्यों को शामिल करना)। इसे कला और विज्ञान दोनों माना जाता है।
  • क्षेत्र: इसके क्षेत्र को समझाने के लिए लूथर गुलिक ने ‘POSDCORB’ सिद्धान्त (Planning, Organizing, Staffing, Directing, Co-ordinating, Reporting, Budgeting) दिया है, जिसके तहत लोक प्रशासन के सभी कार्यात्मक क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है।
  • लोक व निजी प्रशासन में अन्तर: लोक प्रशासन का मुख्य उद्देश्य जन-कल्याण और सार्वजनिक सेवा होता है तथा यह पूर्णतः सरकारी नियंत्रण और नियमों से बंधा होता है। इसके विपरीत, निजी प्रशासन निजी लाभ (Profit) और व्यावसायिक कुशलता के लिए काम करता है, जिसमें नियमों में लचीलापन होता है।
  • अध्ययन पद्धतियाँ: इसके अध्ययन के लिए कई प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं, जिनमें संवैधानिक-कानूनी पद्धति (संस्थाओं के कानूनी ढांचे पर बल), ऐतिहासिक पद्धति (अतीत के अनुभवों का विश्लेषण) और व्यवहारवादी व पारिस्थितिकीय पद्धति (मानवीय व्यवहार और पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन) प्रमुख हैं।

केन्द्रीयकरण, विकेन्द्रीकरण तथा शक्ति का हस्तांतरण

  • केन्द्रीयकरण (Centralization): यह वह प्रशासनिक व्यवस्था है जिसमें निर्णय लेने की अंतिम शक्ति और सत्ता संगठन के शीर्ष स्तर (Top Management) पर केंद्रित होती है। इसमें निचले स्तर के कर्मचारियों को केवल आदेशों का पालन करना होता है, जिससे प्रशासनिक एकरूपता तो रहती है लेकिन निर्णयों में देरी होती है।
  • विकेन्द्रीकरण (Decentralization): इस व्यवस्था में निर्णय लेने की शक्तियों और प्राधिकार को संगठन के निचले या स्थानीय स्तरों तक फैलाया जाता है। यह प्रशासनिक कुशलता को बढ़ाता है और स्थानीय समस्याओं के त्वरित समाधान में सहायक होता है।
  • शक्ति का हस्तांतरण (Delegation/Devolution): जब कोई उच्च अधिकारी या सरकार अपने कार्यों और शक्तियों का कुछ भाग वैधानिक रूप से अपने अधीनस्थों या स्थानीय निकायों को सौंपती है, तो उसे शक्ति का हस्तांतरण कहते हैं। भारत में पंचायती राज व्यवस्था (73वां व 74वां संविधान संशोधन) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

कार्मिक प्रशासन व संघीय लोक सेवा आयोग (UPSC)

  • भर्ती एवं पदोन्नति: भर्ती प्रशासनिक तंत्र के लिए योग्य, कुशल और ईमानदार कर्मचारियों के चयन की आधारशिला है, जो आधुनिक युग में खुली प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से होती है। पदोन्नति (Promotion) कर्मचारियों को उनके अच्छे कार्य के आधार पर निम्न पद से उच्च पद, अधिक उत्तरदायित्व और उच्च वेतनमान पर भेजने की प्रक्रिया है, जो मनोबल बढ़ाने के लिए आवश्यक है।
  • प्रशिक्षण: चयनित कार्मिकों की कार्यक्षमता, कौशल, व्यावहारिक ज्ञान और दृष्टिकोण को प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया को प्रशिक्षण कहते हैं। यह सेवा में प्रवेश के समय (Induction) और सेवा के दौरान (In-service) दोनों रूपों में दिया जाता है।
  • संघीय लोक सेवा आयोग (UPSC): भारतीय संविधान के भाग 14 (अनुच्छेद 315-323) के तहत स्थापित यह एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जिसका मुख्य कार्य देश की केंद्रीय व अखिल भारतीय सेवाओं (जैसे IAS, IPS) के लिए निष्पक्ष रूप से योग्य उम्मीदवारों की भर्ती परीक्षा आयोजित करना है। यह अनुशासनात्मक मामलों में सरकार को परामर्श देने वाली सर्वोच्च संस्था भी है।

वित्तीय प्रशासन – बजट और भारत में बजट निर्माण की प्रक्रिया

  • बजट का अर्थ: बजट किसी भी सरकार के एक आगामी वित्तीय वर्ष के अनुमानित आय (राजस्व) और व्यय (खर्च) का लेखा-जोखा होता है। यह केवल एक वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीतियों को लागू करने का सबसे सशक्त माध्यम है।
  • भारत में बजट निर्माण की प्रक्रिया: भारत में बजट निर्माण का कार्य मुख्य रूप से वित्त मंत्रालय का बजट प्रभाग करता है, जो विभिन्न मंत्रालयों और नीति आयोग से प्रशासनिक खर्चों के अनुमान मंगाता है। इसके बाद बजट को संसद में प्रस्तुतीकरण, आम बहस, विभागीय समितियों द्वारा जांच, अनुदान मांगों पर मतदान, और अंत में विनियोग व वित्त विधेयक के पारित होने के बाद लागू किया जाता है।

विकास प्रशासन – नौकरशाही की प्रकृति एवं कार्य

  • विकास प्रशासन: पारंपरिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने के विपरीत, विकास प्रशासन का सरोकार सामाजिक-आर्थिक प्रगति, राष्ट्र-निर्माण और लोक-कल्याणकारी योजनाओं को गतिशीलता से लागू करने से है। यह पूरी तरह से परिणाम-उन्मुख (Result-oriented) और परिवर्तन-उन्मुख होता है।
  • नौकरशाही (Bureaucracy) की प्रकृति व कार्य: मैक्स वेबर के अनुसार नौकरशाही नियमों पर आधारित, पदसोपान (Hierarchy) से बंधी और विशेषज्ञ अधिकारियों की एक तार्किक व्यवस्था है। विकास प्रशासन में इसकी प्रकृति केवल नियमवादी (Red-tapism) नहीं होनी चाहिए, बल्कि जन-आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए; इसके मुख्य कार्यों में नीतियों का व्यावहारिक क्रियान्वयन, विकास योजनाओं का संचालन और लोक-कल्याणकारी सेवाओं को जनता तक पहुँचाना शामिल है।

लोकपाल एवं लोकायुक्त

  • लोकपाल (Ombudsman): यह देश के उच्च पदों पर बैठे सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं (यहाँ तक कि कुछ मामलों में प्रधानमंत्री भी) के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाली सर्वोच्च संस्था है। प्रशासनिक सुधारों के तहत वर्ष 2013 के अधिनियम द्वारा केंद्र स्तर पर लोकपाल की स्थापना की गई ताकि शासन में शुचिता और पारदर्शिता बनी रहे।
  • लोकायुक्त: केंद्र के लोकपाल की तर्ज पर राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार विरोधी जांच के लिए गठित वैधानिक संस्था को लोकायुक्त कहा जाता है। लोकायुक्त राज्य के मंत्रियों, विधायकों और लोक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग की शिकायतों की स्वतंत्र जांच करता है।

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