MP TET -भाग ब राजनीति विज्ञान ( Political Science) विस्तृत नोट्स भाग -2

खंड 1: राजनीति विज्ञान का परिचय

1. परिभाषा (Definition)

  • शाब्दिक अर्थ: ‘राजनीति’ शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द ‘पॉलिस’ (Polis) से हुई है, जिसका अर्थ ‘नगर-राज्य’ (City-State) होता था।
  • परम्परावादी परिभाषा: गार्नर, ब्लंशली जैसे विचारकों के अनुसार, राजनीति विज्ञान वह शास्त्र है जो मुख्य रूप से राज्य और सरकार का अध्ययन करता है। (गार्नर का प्रसिद्ध कथन: “राजनीति विज्ञान का अंत और आरंभ राज्य के साथ होता है।”)
  • आधुनिक परिभाषा: डेविड ईस्टन, लैसवेल और रॉबर्ट डहल के अनुसार, यह केवल राज्य का नहीं बल्कि शक्ति, सत्ता, प्रभाव, मानव व्यवहार और राजनीतिक प्रक्रियाओं का अध्ययन है।

2. प्रकृति (Nature)

  • क्या राजनीति विज्ञान एक विज्ञान है?
    • हाँ (पक्ष में तर्क): इसमें व्यवस्थित अध्ययन होता है, कार्य-कारण संबंध (Cause and Effect) तलाशे जाते हैं, और इसके अपने कुछ निश्चित सिद्धांत होते हैं। अरस्तू ने इसे “सर्वोच्च विज्ञान” (Master Science) कहा था।
    • नही (विपक्ष में तर्क): भौतिक विज्ञान (Physics) या रसायन विज्ञान (Chemistry) की तरह इसके नियम प्रयोगशाला में परखे नहीं जा सकते, और न ही इंसानी स्वभाव के कारण इसमें 100% सटीक भविष्यवाणी संभव है।
  • निष्कर्ष: यह एक ‘सामाजिक विज्ञान’ (Social Science) और एक ‘कला’ (Art) दोनों है।

3. क्षेत्र (Scope)

राजनीति विज्ञान के अध्ययन का दायरा बहुत व्यापक है, जिसमें शामिल हैं:

  • राज्य और सरकार का अतीत, वर्तमान और भविष्य का अध्ययन।
  • राजनीतिक संस्थाओं, विचारधाराओं (जैसे- समाजवाद, उदारवाद) और संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन।
  • अंतर्राष्ट्रीय संबंधों, संगठनों (जैसे- UNO) और विदेश नीतियों का विश्लेषण।
  • स्थानीय स्वशासन (जैसे- पंचायती राज) और लोक प्रशासन का अध्ययन।

4. राजनीतिक सिद्धान्त: परम्परावादी व आधुनिक (Traditional vs Modern Political Theory)

आधारपरम्परावादी सिद्धान्त (Traditional Theory)आधुनिक सिद्धान्त (Modern Theory)
समयकालद्वितीय विश्व युद्ध (1945) से पहले का काल।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद (विशेषकर व्यवहारवाद के उदय के बाद)।
अध्ययन का केंद्रकेवल औपचारिक संस्थाएं (राज्य, सरकार, संविधान, कानून)।अनौपचारिक संस्थाएं (मानव व्यवहार, दबाव समूह, मतदान प्रक्रिया, शक्ति)।
दृष्टिकोणआदर्शात्मक, दार्शनिक, कानूनी और ऐतिहासिक।वैज्ञानिक, व्यावहारिक, आनुभविक (Empirical) और सांख्यिकीय।
मूल्य (Values)यह ‘मूल्य-प्रधान’ (Value-loaded) है— इसमें ‘क्या होना चाहिए’ पर जोर है।यह ‘मूल्य-निरपेक्ष’ (Value-free) है— इसमें ‘क्या है’ (वास्तविकता) पर जोर है।

5. अन्य विषयों से संबंध (Relation with Other Disciplines)

  • इतिहास से संबंध: इतिहास राजनीति विज्ञान को कच्चा माल (तथ्य और घटनाएं) देता है, और राजनीति विज्ञान इतिहास को दिशा देता है। (“इतिहास के बिना राजनीति विज्ञान की कोई जड़ नहीं और राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास का कोई फल नहीं।”)
  • अर्थशास्त्र से संबंध: प्राचीन काल में इसे ‘राजनीतिक अर्थव्यवस्था’ कहा जाता था। राज्य की नीतियां अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं और आर्थिक परिस्थितियां (जैसे गरीबी, बेरोजगारी) राजनीति को बदल देती हैं।
  • समाजशास्त्र से संबंध: समाज की बुनियादी संस्थाओं (जाति, धर्म, वर्ग) का राजनीतिक व्यवहार पर गहरा असर पड़ता है। इसी जुड़ाव से ‘राजनीतिक समाजशास्त्र’ (Political Sociology) का जन्म हुआ।
  • नीतिशास्त्र (Ethics) से संबंध: परम्परावादी राजनीति पूरी तरह नैतिकता और न्याय की अवधारणा पर टिकी हुई है।

खंड 2: शक्ति एवं अधिकार

1. शक्ति एवं अधिकार की अवधारणा (Concept of Power and Authority)

  • शक्ति (Power): किसी दूसरे व्यक्ति या समूह के व्यवहार को अपनी इच्छा के अनुसार बदलने की क्षमता ‘शक्ति’ कहलाती है। यह बल या दबाव पर आधारित हो सकती है।
  • अधिकार/सत्ता (Authority): जब शक्ति को ‘वैधता’ (Legitimacy) या जनता की कानूनी मंजूरी मिल जाती है, तो वह ‘सत्ता’ या ‘अधिकार’ बन जाती है।
    • उदाहरण: एक डाकू बंदूक दिखाकर पैसे मांगता है, तो वह उसकी शक्ति है। लेकिन एक पुलिसकर्मी या टैक्स अधिकारी कानून के तहत कार्रवाई करता है, तो वह उसका अधिकार (सत्ता) है।
  • मैक्स वेबर के अनुसार सत्ता के 3 प्रकार:
    1. पारम्परिक सत्ता (Traditional)
    2. करिश्माई सत्ता (Charismatic)
    3. कानूनी-तार्किक सत्ता (Rational-Legal)

2. राज्य की उत्पत्ति के सिद्धांत (Theories of the Origin of the State)

राज्य कैसे अस्तित्व में आया, इसे समझाने के लिए कई सिद्धांत हैं:

  • दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत: राज्य ईश्वर द्वारा बनाया गया है और राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है।
  • शक्ति का सिद्धांत: राज्य की स्थापना बल प्रयोग और युद्धों के माध्यम से ‘मजबूतों द्वारा कमजोरों को दबाकर’ की गई है।
  • सामाजिक समझौते का सिद्धांत (Social Contract Theory): थॉमस हॉब्स, जॉन लॉक और जीन-जैक्स रूसो के अनुसार, लोगों ने अपनी प्राकृतिक अवस्था की समस्याओं से बचने के लिए आपस में एक समझौता करके राज्य को बनाया है।
  • ऐतिहासिक या विकासवादी सिद्धांत: यह सबसे वैज्ञानिक सिद्धांत है। इसके अनुसार राज्य किसी एक दिन या समझौते से नहीं बना, बल्कि यह परिवार, धर्म, शक्ति और राजनीतिक चेतना के क्रमिक विकास का परिणाम है।

3. साम्राज्यवाद (Imperialism)

  • अर्थ: जब कोई शक्तिशाली देश अपनी सीमाओं से बाहर जाकर किसी अन्य कमजोर देश पर आर्थिक, राजनीतिक या सैन्य नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं।
  • उद्देश्य: कच्चे माल की प्राप्ति, नए बाजार खोजना और अपनी राजनीतिक शक्ति का विस्तार करना (जैसे ब्रिटिश शासन का भारत पर नियंत्रण)।

4. साम्राज्यवाद की बहुलवादी आलोचना (Pluralist Criticism of Imperialism)

  • बहुलवाद (Pluralism) क्या है? बहुलवादी विचारक राज्य को एकमात्र सर्वोच्च शक्ति नहीं मानते। उनका मानना है कि समाज में राज्य की तरह अन्य सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संगठन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
  • आलोचना के मुख्य बिंदु:
    • बहुलवादी विचारकों के अनुसार, साम्राज्यवाद केवल एक ‘शक्तिशाली राज्य की संप्रभुता’ के अहंकार का परिणाम है, जो दूसरे समाजों की सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता को नष्ट कर देता है।
    • यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शक्ति के केंद्रीकरण को बढ़ावा देता है, जबकि बहुलवादी वैश्विक स्तर पर शक्तियों के विकेंद्रीकरण (Decentralization) और स्वायत्तता के समर्थक हैं।
    • यह विभिन्न समुदायों और मानव समूहों के बीच शांतिपूर्ण और सहयोगात्मक संबंधों के विकास में सबसे बड़ी बाधा है।

खंड 3: नागरिक अधिकार व स्वतंत्रता

1. मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य

  • मौलिक अधिकार (Fundamental Rights): ये वे बुनियादी अधिकार हैं जो नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन, समानता और राज्य के शोषण से सुरक्षा देने के लिए संविधान द्वारा गारंटीकृत किए जाते हैं।
    • भारतीय संदर्भ: यह संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12-35) में वर्णित है। इसे अमेरिका के ‘बिल ऑफ राइट्स’ से लिया गया है। मूल संविधान में सात अधिकार थे, लेकिन वर्तमान में छह मौलिक अधिकार हैं (44वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा संपत्ति के अधिकार को हटा दिया गया)।
    • छह अधिकार: समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार, तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार (डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने इसे संविधान की “आत्मा और हृदय” कहा था)।
  • मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties): ये नागरिकों को राष्ट्र के प्रति उनके सामाजिक और नागरिक दायित्वों की याद दिलाते हैं।
    • भारतीय संदर्भ: इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा भाग IV-A (अनुच्छेद 51-A) में जोड़ा गया। इन्हें पूर्व सोवियत संघ (USSR) से लिया गया है। शुरुआत में ये 10 थे, वर्तमान में इनकी संख्या 11 है (11वां कर्तव्य 2002 में बच्चों की शिक्षा से संबंधित जोड़ा गया)।

2. राज्य के नीति निर्देशक तत्व – DPSP

  • अवधारणा: ये वे आदर्श या दिशानिर्देश हैं जिन्हें केंद्र और राज्य सरकारों को नीतियां और कानून बनाते समय ध्यान में रखना होता है। इनका उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना है।
  • मुख्य विशेषताएं: ये संविधान के भाग IV (अनुच्छेद 36-51) में शामिल हैं और इन्हें आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। ये गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं, यानी इनके लागू न होने पर आप कोर्ट नहीं जा सकते।
  • वर्गीकरण: इन्हें तीन विचारधाराओं में बांटा गया है— समाजवादी सिद्धांत, गांधीवादी सिद्धांत, और उदार-बौद्धिक सिद्धांत।

3. मानव अधिकार (Human Rights)

  • अवधारणा: ये वे सार्वभौमिक नैतिक अधिकार हैं जो हर व्यक्ति को इंसान होने के नाते मिलते हैं, चाहे उसकी राष्ट्रीयता, जाति, लिंग या धर्म कुछ भी हो।
  • मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR): संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा 10 दिसंबर 1948 को इसे अपनाया गया था (इसीलिए हर साल 10 दिसंबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस’ मनाया जाता है)।

4. स्वतंत्रता, समानता एवं न्याय

  • स्वतंत्रता (Liberty): इसका अर्थ व्यक्ति पर किसी भी अनुचित प्रतिबंध का न होना और उसके व्यक्तिगत विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना है। इसके दो रूप हैं— नकारात्मक स्वतंत्रता (बंधनों का अभाव) और सकारात्मक स्वतंत्रता (समर्थ बनाने वाली स्थितियों की उपस्थिति)।
  • समानता (Equality): समाज में किसी भी वर्ग के लिए विशेष विशेषाधिकारों का न होना और बिना किसी भेदभाव के सभी को समान अवसर मिलना। इसके मुख्य आयाम कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक समानता हैं।
  • न्याय (Justice): कानूनों और समाज की नैतिक निष्पक्षता। जॉन रॉल्स ने इसे “सामाजिक संस्थाओं का प्रथम गुण” कहा है। इसमें कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक न्याय (संसाधनों का उचित वितरण) शामिल हैं।

खंड 4: प्रजातंत्र व शासन के अंग

1. प्रजातंत्र का अर्थ (Meaning of Democracy)

  • अवधारणा: यह ग्रीक शब्द Demos (जनता) और Kratos (शक्ति) से मिलकर बना है। अब्राहम लिंकन के अनुसार— “लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन है।”
  • प्रकार:
    • प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy): जहाँ नागरिक सीधे निर्णय लेने में भाग लेते हैं (जैसे प्राचीन एथेंस, आधुनिक स्विट्जरलैंड)।
    • अप्रत्यक्ष/प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र (Indirect Democracy): जहाँ नागरिक अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं और वे प्रतिनिधि कानून व शासन चलाते हैं (जैसे भारत, अमेरिका)।

2. प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त (Principles of Representation)

  • न्यासधारी मॉडल (Trustee Model): एडमंड बर्क के अनुसार, प्रतिनिधि मतदाताओं की तात्कालिक इच्छाओं के बजाय अपने विवेक और बुद्धि से निर्णय लेता है।
  • प्रतिनिधि मॉडल (Delegate Model): इसमें प्रतिनिधि पूरी तरह से अपने मतदाताओं के दूत के रूप में काम करता है और वही बोलता है जो उसकी जनता चाहती है।
  • जनादेश मॉडल (Mandate Model): इसमें प्रतिनिधि अपनी राजनीतिक पार्टी के घोषणापत्र (Manifesto) और विचारधारा से बंधा होता है।

3. विकास एवं कल्याणकारी राज्य (Welfare State)

  • कल्याणकारी राज्य: शासन का वह मॉडल जहाँ राज्य केवल कानून-व्यवस्था (पुलिस राज्य) तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अपने नागरिकों के आर्थिक और सामाजिक कल्याण (जैसे मुफ्त स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन) में सक्रिय भूमिका निभाता है।

4. शासन के तीन अंग (Organs of Government)

  • व्यवस्थापिका (Legislature): इसका काम कानून बनाना है। यह जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है और राष्ट्रीय नीतियों पर बहस करती है (जैसे भारत में संसद, अमेरिका में कांग्रेस)।
  • कार्यपालिका (Executive): व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने और देश का शासन चलाने के लिए जिम्मेदार अंग। इसमें राजनीतिक कार्यपालिका (मंत्री) और स्थायी कार्यपालिका (नौकरशाह/IAS) शामिल हैं।
  • न्यायपालिका (Judiciary): कानूनों की व्याख्या करने, विवादों को सुलझाने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाला अंग। यह संविधान की संरक्षक होती है।

5. शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त (Separation of Powers)

  • प्रतिपादक: फ्रांसीसी दार्शनिक मोंटेस्क्यू ने अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ द लॉज’ (1748) में इसका प्रतिपादन किया।
  • अवधारणा: तानाशाही को रोकने और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए शासन के तीनों अंगों (व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) के कार्य और शक्तियां अलग-अलग संस्थाओं के हाथों में होनी चाहिए।
  • नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances): इसके तहत तीनों अंग एक-दूसरे की शक्तियों पर नजर रखते हैं और संतुलन बनाए रखते हैं (जैसे अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था)।

खंड 5: संविधान व शासन प्रणालियाँ

1. संविधान का अर्थ, स्रोत व प्रकार

  • अर्थ: यह राज्य का सर्वोच्च और मौलिक कानूनी दस्तावेज होता है, जिसके अनुसार देश की शासन व्यवस्था चलाई जाती है।
  • प्रकार:
    • लिखित बनाम अलिखित: लिखित संविधान एक निश्चित दस्तावेज के रूप में संहिताबद्ध होता है (जैसे भारत, अमेरिका)। अलिखित संविधान परंपराओं, प्रथाओं और समय-समय पर बने कानूनों पर आधारित होता है (जैसे ब्रिटेन)।
    • कठोर बनाम लचीला: कठोर संविधान में संशोधन के लिए एक विशेष और जटिल प्रक्रिया की जरूरत होती है (जैसे अमेरिका)। लचीले संविधान में सामान्य कानून की तरह आसानी से संशोधन हो जाता है (जैसे ब्रिटेन)। भारत का संविधान दोनों का अनूठा मिश्रण है।

2. शासन प्रणालियाँ (Systems of Government)

आधारसंसदीय प्रणाली (Parliamentary System)अध्यक्षीय प्रणाली (Presidential System)
कार्यपालिका की संरचनादोहरी कार्यपालिका होती है: नाममात्र का प्रमुख (राष्ट्रपति/राजा) और वास्तविक प्रमुख (प्रधानमंत्री)।एकल कार्यपालिका होती है: राष्ट्रपति ही राज्य और सरकार दोनों का प्रमुख होता है।
जवाबदेहीकार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) अनिवार्य रूप से व्यवस्थापिका (संसद) के प्रति जवाबदेह होती है।कार्यपालिका पूरी तरह से व्यवस्थापिका से स्वतंत्र होती है।
स्थायित्वकार्यकाल अनिश्चित होता है; बहुमत खोने पर सरकार गिर जाती है।कार्यकाल निश्चित होता है; राष्ट्रपति को आसानी से नहीं हटाया जा सकता।
उदाहरणभारत, ब्रिटेन।संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)।
आधारएकात्मक प्रणाली (Unitary System)संघीय प्रणाली (Federal System)
शक्तियों का वितरणसारी शक्तियां केंद्र सरकार के पास होती हैं। राज्य सरकारें केंद्र के अधीन होती हैं।शक्तियां संविधान द्वारा केंद्र और राज्य सरकारों के बीच स्पष्ट रूप से विभाजित होती हैं।
संविधानलिखित या अलिखित; लचीला या कठोर हो सकता है।संविधान का लिखित, सर्वोच्च और कठोर होना अनिवार्य है ताकि राज्यों की स्वायत्तता बची रहे।
नागरिकताकेवल इकहरी (सिंगल) नागरिकता होती है।अक्सर दोहरी नागरिकता होती है (जैसे अमेरिका), हालांकि भारत इसका अपवाद है जहाँ संघीय व्यवस्था में भी इकहरी नागरिकता है।
उदाहरणब्रिटेन, फ्रांस, जापान।अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया।

3. दलीय पद्धति और दबाव समूह (Party System & Pressure Groups)

  • दलीय पद्धतियाँ:
    • एक-दलीय पद्धति: जहाँ केवल एक ही राजनीतिक दल को शासन करने की कानूनी अनुमति होती है (जैसे चीन)।
    • द्वि-दलीय पद्धति: जहाँ मुख्य रूप से दो बड़े दलों का वर्चस्व होता है (जैसे अमेरिका में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन; ब्रिटेन में कंजर्वेटिव और लेबर पार्टी)।
    • बहु-दलीय पद्धति: जहाँ कई राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं और अक्सर गठबंधन सरकारें बनती हैं (जैसे भारत, फ्रांस)।
  • दबाव समूह (Pressure Groups): यह ऐसे संगठित लोगों का समूह होता है जो बिना चुनाव लड़े या बिना औपचारिक सत्ता संभाले, बाहर से सरकार के निर्णयों और नीतियों को अपने हितों में प्रभावित करने का प्रयास करते हैं (जैसे मजदूर संगठन, छात्र संगठन, व्यापारिक संघ जैसे FICCI)।

खंड 6: भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का संक्षिप्त इतिहास

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास को मुख्य रूप से तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है:

1. उदारवादी चरण (Moderate Phase: 1885–1905)

  • शुरुआत: दिसंबर 1885 में ए.ओ. ह्यूम द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना के साथ।
  • प्रमुख नेता: दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, सुरेंद्रनाथ बनर्जी।
  • तरीके: ये शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों पर भरोसा करते थे, जिन्हें 3Ps: Prayers (प्रार्थना), Petitions (याचिका), और Protests (विरोध) कहा जाता था। इनका ध्यान प्रशासनिक सुधारों पर था।

2. उग्रवादी/उग्र राष्ट्रवादी चरण (Extremist Phase: 1905–1919)

  • कारण: लॉर्ड कर्जन द्वारा 1905 में किया गया बंगाल का विभाजन।
  • प्रमुख नेता: प्रसिद्ध तिकड़ी लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) और अरविंद घोष। तिलक ने नारा दिया: “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
  • तरीके: इन्होंने याचिकाओं के बजाय स्वदेशी आंदोलन, विदेशी सामानों का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध (Passive Resistance) को अपनाया। 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन हुआ।

3. गाँधीवादी चरण (Gandhian Phase: 1919–1947)

  • मोड़: 1915 में महात्मा गांधी की दक्षिण अफ्रीका से वापसी और 1919 के आसपास राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व संभालना।
  • मूल दर्शन: सत्याग्रह (सत्य के लिए आग्रह) और अहिंसा।
  • प्रमुख जन आंदोलन:
    • असहयोग आंदोलन (1920-22): रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में शुरू हुआ; चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद इसे वापस ले लिया गया।
    • सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930): नमक कानून के खिलाफ ऐतिहासिक दांडी मार्च से इसकी शुरुआत हुई।
    • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया और अंग्रेजों से तुरंत भारत छोड़ने की मांग की।
  • परिणाम: इन सामूहिक आंदोलनों, क्रांतिकारी गतिविधियों (भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज) और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदली वैश्विक राजनीति के संयुक्त प्रभाव के कारण ब्रिटिश शासन को झुकना पड़ा और 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।

1. निर्वाचन आयोग (Election Commission)

  • परिचय व संरचना:
    • भारतीय संविधान के भाग XV (अनुच्छेद 324-329) के तहत भारत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त, संवैधानिक संस्था है जो देश में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार है।
    • यह एक त्रि-सदस्यीय निकाय है, जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त (EC) होते हैं।
    • इनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है [1] और इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है।
  • प्रमुख कार्य:
    • चुनावों का संचालन: लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करना।
    • नामांकन व मतदाता सूची: मतदाता सूचियां तैयार करना, फोटो पहचान पत्र (EPIC) जारी करना और योग्य मतदाताओं का पंजीकरण करना।
    • दलों को मान्यता व चुनाव चिह्न: राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता देना [1] और उन्हें अद्वितीय चुनाव चिह्न आवंटित करना।
    • आचार संहिता लागू करना: चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए ‘आदर्श आचार संहिता’ (Model Code of Conduct) तैयार करना और उसका कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना।

2. संघीय शासन व्यवस्था (Union Government)

  • संघीय शासन का अर्थ, परिभाषा व विशेषताएँ:
    • अर्थ: एक ऐसी शासन प्रणाली जिसमें सत्ता का विभाजन एक केंद्रीय प्राधिकरण और विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों (राज्यों) के बीच होता है।
    • विशेषताएँ: लिखित और सर्वोच्च संविधान, शक्तियों का स्पष्ट विभाजन (संघ, राज्य और समवर्ती सूची), द्विसदनीय विधायिका और एक स्वतंत्र न्यायपालिका।
  • राष्ट्रपति (The President):
    • संविधान के अनुच्छेद 52 के अनुसार, राष्ट्रपति भारत का राज्य प्रमुख (Head of State) और देश का प्रथम नागरिक होता है।
    • वह नाममात्र का कार्यपालिका प्रमुख (Nominal Executive) होता है, जिसकी सभी शक्तियों का प्रयोग व्यावहारिक रूप से प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद करती है।
  • संसद (The Parliament):
    • भारत की सर्वोच्च विधायी संस्था है, जो राष्ट्रपति और दो सदनों— लोकसभा (निचला सदन) और राज्यसभा (उच्च सदन) से मिलकर बनती है।
    • इसका मुख्य कार्य देश के लिए कानून बनाना, बजट पास करना और कार्यपालिका पर नियंत्रण रखना है।
  • प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट (Prime Minister & Cabinet):
    • प्रधानमंत्री: सरकार का वास्तविक प्रमुख (Real Executive) होता है। राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
    • कैबिनेट/मंत्रिपरिषद: प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। कैबिनेट मंत्रिपरिषद का वह छोटा और सबसे शक्तिशाली कोर समूह है जो देश के सभी महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court):
    • भारत की एकीकृत न्यायपालिका का शीर्ष न्यायालय है।
    • यह संविधान का संरक्षक और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का रक्षक है। इसे न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति प्राप्त है, जिसके तहत यह संसद द्वारा बनाए गए किसी भी असंवैधानिक कानून को रद्द कर सकता है।

3. राज्य शासन व्यवस्था (State Government)

  • राज्यपाल (The Governor):
    • राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। इसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
    • कर्तव्य: राज्य विधानसभा के सत्र को बुलाना/भंग करना, मुख्यमंत्री की नियुक्ति करना, और राज्य के विधेयकों को कानून बनने की मंजूरी देना या राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना।
  • राज्य विधायिका (विधानसभा और विधान परिषद):
    • विधानसभा (Legislative Assembly): यह राज्य का निचला और शक्तिशाली सदन है, जिसके सदस्य (MLA) सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं।
    • विधान परिषद (Legislative Council): यह राज्य का उच्च सदन है, जो वर्तमान में भारत के केवल कुछ ही राज्यों में अस्तित्व में है। यह एक स्थायी सदन है जिसे भंग नहीं किया जा सकता।
  • मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद:
    • मुख्यमंत्री: राज्य सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है। राज्यपाल विधानसभा में बहुमत दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।
    • मंत्रिपरिषद: मुख्यमंत्री की सलाह पर गठित मंत्रियों का समूह, जो सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति जवाबदेह होता है।
  • केन्द्र व राज्य संबंध (Centre-State Relations):
    • इन्हें तीन भागों में विभाजित किया गया है: विधायी संबंध (कानून बनाने की शक्तियां), प्रशासनिक संबंध (नीतियों को लागू करने का नियंत्रण) और वित्तीय संबंध (करों और राजस्व का वितरण)।
    • शक्तियों के संतुलन के लिए सरकारी आयोग और पूंछी आयोग जैसे विभिन्न आयोगों का गठन किया गया है।

4. राजनीतिक दल एवं मुख्य मुद्दे (Political Parties & Core Issues)

  • राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दल:
    • राष्ट्रीय दल: वे दल जिनका प्रभाव देश के कई राज्यों में होता है और जो निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित मानदंडों (जैसे न्यूनतम चार राज्यों में वैध मतों का निश्चित प्रतिशत या सीटें हासिल करना) को पूरा करते हैं (उदा. BJP, INC, AAP आदि)।
    • क्षेत्रीय/राज्य स्तरीय दल: वे दल जिनका प्रभाव और जनाधार मुख्य रूप से किसी एक विशिष्ट राज्य या क्षेत्र तक सीमित होता है (उदा. SP, DMK, TMC आदि)।
  • भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे:
    • जाति (Caste): भारतीय राजनीति में जाति एक बहुत बड़ा कारक है। टिकटों के बंटवारे से लेकर मतदान के पैटर्न तक में जातिगत समीकरण (जैसे आरक्षण और वोट बैंक की राजनीति) अहम भूमिका निभाते हैं।
    • धर्म (Religion): धर्मनिरपेक्ष संविधान के बावजूद, धार्मिक ध्रुवीकरण, सांप्रदायिकता और तुष्टिकरण की राजनीति भारतीय चुनावों और राजनीतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित करती है।
    • भाषा (Language): भाषाई पहचान और राज्यों का पुनर्गठन हमेशा से संवेदनशील मुद्दा रहा है। त्रि-भाषा सूत्र (Three-language formula) और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने से जुड़े विवाद इसके उदाहरण हैं।
    • क्षेत्रीयता (Regionalism): अपने क्षेत्र के विकास, स्वायत्तता या भाषाई-सांस्कृतिक गौरव को देश के हितों से ऊपर रखना। कई बार यह नए राज्यों की मांग या उग्र क्षेत्रीय आंदोलनों का रूप ले लेता है।
    • गरीबी (Poverty): आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी भारतीय राजनीति के सबसे बड़े मुद्दों में से एक है। सरकारें अक्सर मुफ्त कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) और सब्सिडी के जरिए इसे संबोधित करने का प्रयास करती हैं।

1. राजनैतिक चिंतन का स्वरूप (Political Thoughts)

अ. भारतीय राजनीतिक विचारक (Indian Political Thinkers)

कौटिल्य (चाणक्य): इन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य व्यवस्था का प्रतिपादन किया। इनका ‘सप्तांग सिद्धांत’ राज्य के 7 अंगों (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड, मित्र) को समझाता है। इन्होंने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए ‘मंडल सिद्धांत’ और ‘षड्गुण्य नीति’ दी।


राजा राममोहन राय: इन्हें ‘आधुनिक भारत का जनक’ और भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत कहा जाता है। इन्होंने स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी और महिलाओं के अधिकारों का पुरजोर समर्थन किया तथा सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया।


दयानंद सरस्वती: इन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना की और ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया। इनके चिंतन में ‘स्वदेशी’ और ‘स्वराज’ की शुरुआती झलक मिलती है, जहाँ इन्होंने विदेशी शासन की तुलना में स्वदेशी शासन को श्रेष्ठ माना।


महात्मा गांधी: इनके राजनीतिक विचार नैतिकता और धर्म (कर्तव्य) पर आधारित थे। इन्होंने राजनीति का आध्यात्मिकरण किया। इनके मुख्य विचार सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, सर्वोदय (सभी का उदय) और ट्रस्टीशिप (न्यासिता) का सिद्धांत हैं।


डॉ. बी. आर. अम्बेडकर: ये भारतीय संविधान के निर्माता और सामाजिक न्याय के सबसे बड़े प्रणेता थे। इन्होंने जाति प्रथा के उन्मूलन (Annihilation of Caste) पर बल दिया और दलितों, महिलाओं व वंचितों के कानूनी व राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया।


लोकमान्य तिलक: ये उग्र राष्ट्रवादी चरण के प्रमुख नेता थे। इन्होंने नारा दिया— “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” इन्होंने जनता में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए ‘केसरी’ व ‘मराठा’ अखबार शुरू किए और गणेश उत्सव व शिवाजी उत्सव की शुरुआत की।

ब. पाश्चात्य राजनैतिक चिंतक (Western Political Thinkers)

सुकरात (Socrates): इन्होंने ज्ञान को ही सद्गुण (Virtue) माना। इनकी द्वंदात्मक/प्रश्न-उत्तर पद्धति (Dialectic Method) ने पाश्चात्य दर्शन की नींव रखी। इन्होंने स्थापित व्यवस्था की तार्किक आलोचना की, जिसके कारण इन्हें विष का प्याला पीना पड़ा।


प्लेटो (Plato): सुकरात के शिष्य प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द रिपब्लिक’ में एक आदर्श राज्य की कल्पना की, जिसका शासक एक ‘दार्शनिक राजा’ होना चाहिए। इन्होंने न्याय का सिद्धांत और न्याय बनाए रखने के लिए अभिभावक वर्ग (शासक व सैनिक) के लिए ‘साम्यवाद’ (सम्पत्ति और परिवार का साम्यवाद) का प्रतिपादन किया।


अरस्तू (Aristotle): इन्हें ‘राजनीति विज्ञान का जनक’ कहा जाता है क्योंकि इन्होंने 158 देशों के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया था। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘पॉलिटिक्स’ है। इन्होंने राज्य को एक प्राकृतिक संस्था माना और नागरिकता, दासता व क्रांति पर महत्वपूर्ण विचार दिए।


मैकियावेली (Machiavelli): इन्हें ‘आधुनिक राजनीतिक चिंतन का जनक’ कहा जाता है क्योंकि इन्होंने राजनीति को धर्म और नैतिकता से पूरी तरह अलग किया। अपनी पुस्तक ‘द प्रिंस’ में इन्होंने शासक को सलाह दी कि राज्य की सुरक्षा के लिए उसे शेर की तरह बहादुर और लोमड़ी की तरह चालाक होना चाहिए।


रूसो (Rousseau): ये एक सामाजिक समझौते के विचारक थे। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ है। इन्होंने ‘सामान्य इच्छा’ (General Will) का सिद्धांत दिया, जो लोकप्रिय संप्रभुता (Popular Sovereignty) और प्रत्यक्ष लोकतंत्र का आधार बना। इनका प्रसिद्ध कथन है— “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा रहता है।”


2. राजनैतिक विचारधाराएं (Political Ideologies)

  • उदारवाद (Liberalism): यह विचारधारा व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के शासन, निजी संपत्ति, लोकतंत्र और सीमित राज्य की वकालत करती है। जॉन लॉक को इसका जनक माना जाता है। शास्त्रीय उदारवाद राज्य को एक ‘आवश्यक बुराई’ (Necessary Evil) मानता है, जबकि आधुनिक उदारवाद कल्याणकारी राज्य का समर्थन करता है।
  • समाजवाद (Socialism): यह विचारधारा पूंजीवाद का विरोध करती है और समाज में आर्थिक समानता, उत्पादन के साधनों पर सार्वजनिक/राज्य का स्वामित्व, और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण पर बल देती है।
  • मार्क्सवाद (Marxism): कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित यह एक उग्र समाजवादी विचारधारा है। यह इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या (Historical Materialism), वर्ग संघर्ष (Class Struggle) और अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अंतिम लक्ष्य एक ‘वर्गहीन और राज्यहीन समाज’ (साम्यवाद) की स्थापना करना है, जो क्रांति के माध्यम से संभव है।
  • गांधीवाद (Gandhism): यह महात्मा गांधी के विचारों का समूह है जो सत्य, अहिंसा और साध्य की पवित्रता (Means and Ends) पर टिका है। यह विकेंद्रीकरण, कुटीर उद्योगों (खादी), ग्राम स्वराज और राज्यविहीन अहिंसक समाज (रामराज्य) की कल्पना करता है। यह मार्क्सवाद की तरह हिंसक क्रांति का समर्थन नहीं करता।

3. विश्व की महत्वपूर्ण शासन प्रणालियाँ (World Constitutions)

अ. ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) व स्विटजरलैण्ड की शासन प्रणाली

  • ब्रिटेन: यहाँ संसदीय लोकतंत्र और संवैधानिक राजतंत्र है। ब्रिटेन का संविधान ‘अलिखित’ और अत्यधिक ‘लचीला’ है। यहाँ संसद सर्वोच्च है (संसदीय संप्रभुता) और एकात्मक शासन प्रणाली लागू है।
  • U.S.A. (अमेरिका): यहाँ अध्यक्षीय शासन प्रणाली और संघीय व्यवस्था है। अमेरिका का संविधान विश्व का पहला ‘लिखित’ और अत्यंत ‘कठोर’ संविधान है। यहाँ शक्तियों का पूर्ण पृथक्करण (Separation of Powers) और न्यायपालिका की सर्वोच्चता (Judicial Supremacy) पाई जाती है।
  • स्विटजरलैंड: यह देश प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ बहुल कार्यपालिका (सात सदस्यों की संघीय परिषद) होती है। जनता सीधे कानून बनाने की प्रक्रिया में ‘जनमत संग्रह’ (Referendum) और ‘उपेक्षा’ (Initiative) के माध्यम से भाग लेती है।

ब. अमेरिका तथा स्विटजरलैण्ड के संविधान संशोधन प्रक्रिया का तुलनात्मक अध्ययन

तुलना का आधारसंयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.)स्विटजरलैंड (Switzerland)
प्रक्रिया की प्रकृतिअत्यधिक कठोर और जटिल।कठोर, लेकिन जनता की सीधी भागीदारी के कारण लचीलापन।
संशोधन का प्रस्तावकांग्रेस के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत द्वारा या राज्यों के 2/3 राष्ट्रीय सम्मेलन द्वारा।संघीय संसद द्वारा या 1 लाख नागरिकों के हस्ताक्षर (Initiative) द्वारा।
अनुमोदन/मंजूरीकुल 50 राज्यों में से 3/4 राज्यों की विधानसभाओं या सम्मेलनों द्वारा मंजूरी मिलना अनिवार्य है।जनता के बहुमत (Referendum) और कैंटनों (राज्यों) के बहुमत द्वारा मंजूरी मिलना अनिवार्य है।
जनता की सीधी भूमिकासंशोधन प्रक्रिया में जनता की कोई सीधी भूमिका नहीं होती।संशोधन बिना जनमत संग्रह (Referendum) के पास नहीं हो सकता।

4. भारत एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध (India & International Relations)

अ. विश्व राजनीति में भारत की स्थिति व विदेश नीति

  • विश्व राजनीति में भारत: भारत वर्तमान में एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति है। यह G20, BRICS, और SCO जैसे शक्तिशाली वैश्विक संगठनों का एक प्रमुख स्तंभ है। भारत ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आवाज़ के रूप में नेतृत्व करता है।
  • भारत की विदेश नीति के सिद्धांत व उद्देश्य:
    • गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment): शीतयुद्ध के दौरान किसी भी सैन्य गुट (अमेरिका या सोवियत संघ) में शामिल न होने की नीति।
    • पंचशील सिद्धांत (1954): एक-दूसरे की अखंडता का सम्मान, अनाक्रमण, आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप, समानता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
    • उद्देश्य: राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास के लिए वैश्विक सहयोग, और विश्व शांति को बढ़ावा देना।
    • तत्व एवं समस्याएं: भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक विरासत और संसाधन इसके मुख्य तत्व हैं। सीमा विवाद (चीन और पाकिस्तान के साथ), आतंकवाद, और वैश्विक महाशक्तियों (अमेरिका-रूस-चीन) के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाना इसकी मुख्य समस्याएं हैं।

ब. संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO)

  • कार्यप्रणाली: इसकी स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई थी। इसके 6 मुख्य अंग हैं, जिनमें सुरक्षा परिषद (Security Council) सबसे शक्तिशाली है (5 स्थायी सदस्य वीटो पावर के साथ)। इसका मुख्य कार्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना है।
  • अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ: UNO और वैश्विक व्यवस्था के तहत काम करने वाली संस्थाएं जैसे विश्व बैंक (World Bank) और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) विकासशील देशों को आर्थिक सहायता, ऋण और वित्तीय स्थिरता देने का कार्य करती हैं।

स. क्षेत्रीय संगठन व भारत (Regional Organizations & India)

  • भारत तथा संयुक्त राष्ट्र (UN): भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है और इसके शांति अभियानों (Peacekeeping) में सबसे बड़ा योगदानकर्ताओं में से एक है। भारत वर्तमान में सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता (Permanent Seat) के लिए दावा कर रहा है।
  • दक्षेस (SAARC): दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन। पाकिस्तान के असहयोग और आतंकवाद के कारण यह संगठन वर्तमान में लगभग निष्क्रिय है।
  • आसियान (ASEAN): दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन। भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ (Act East Policy) के तहत आसियान देशों के साथ मजबूत आर्थिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित हैं।
  • यूरोपीय साझा व्यापार (European Union – EU): यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। भारत और EU के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिए निरंतर बातचीत जारी है।

द. वैश्वीकरण एवं निशस्त्रीकरण (Globalization & Disarmament)

  • वैश्वीकरण (Globalization): विभिन्न देशों के बीच विचारों, वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और तकनीकी के मुक्त प्रवाह या एकीकरण को वैश्वीकरण कहते हैं। इसने भारत को आर्थिक रूप से मजबूत किया है, लेकिन इसके साथ ही घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और सांस्कृतिक प्रभाव जैसी चुनौतियाँ भी आई हैं।
  • निशस्त्रीकरण (Disarmament): विश्व को विनाशकारी हथियारों (विशेषकर परमाणु हथियारों) से मुक्त करने का प्रयास।
    • भारत का रुख: भारत पूर्ण, सार्वभौमिक और गैर-भेदभावपूर्ण निशस्त्रीकरण का समर्थन करता है। भारत ने CTBT और NPT जैसी संधियों पर इसलिए हस्ताक्षर नहीं किए क्योंकि ये भेदभावपूर्ण हैं (कुछ देशों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति देती हैं और दूसरों को रोकती हैं)। हालांकि, भारत अपनी ‘No First Use’ (पहले परमाणु हमला न करने) की नीति के प्रति प्रतिबद्ध है।

1. लोक प्रशासन: अर्थ, प्रकृति एवं क्षेत्र (Public Administration: Meaning, Nature & Scope)

  • अर्थ (Meaning): लोक प्रशासन दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘लोक’ अर्थात जनता/सरकारी और ‘प्रशासन’ अर्थात कार्यों का प्रबंधन करना। सरल शब्दों में, सरकारी नीतियों और कानूनों को व्यावहारिक रूप से लागू करना ही लोक प्रशासन है। एल. डी. ह्वाइट के अनुसार, “लोक प्रशासन में वे सभी कार्य आते हैं, जिनका उद्देश्य सार्वजनिक नीति को पूरा करना या लागू करना होता है।”
  • प्रकृति (Nature): इसकी प्रकृति को लेकर दो मुख्य दृष्टिकोण हैं:
    • एकीकृत दृष्टिकोण (Integral View): इसके अनुसार प्रशासन में चपरासी से लेकर सचिव (Top to Bottom) तक के सभी कर्मचारियों के कार्य शामिल हैं।
    • प्रबंधकीय दृष्टिकोण (Managerial View): इसके अनुसार प्रशासन में केवल उच्च अधिकारियों के प्रबंधकीय और निर्णय लेने वाले कार्य ही शामिल होते हैं।
  • क्षेत्र (Scope – POSDCORB): लूथर गुलिक ने लोक प्रशासन के क्षेत्र को समझाने के लिए ‘POSDCORB’ का प्रसिद्ध सूत्र दिया:
    • P – Planning (योजना बनाना)
    • O – Organizing (संगठन बनाना)
    • S – Staffing (कर्मचारियों की नियुक्ति)
    • D – Directing (निर्देश देना)
    • CO – Coordinating (समन्वय स्थापित करना)
    • R – Reporting (रिपोर्ट या प्रतिवेदन तैयार करना)
    • B – Budgeting (बजट बनाना और वित्तीय प्रबंधन)

लोक प्रशासन एवं निजी प्रशासन में अन्तर (Public vs Private Administration)

  • लोक प्रशासन (सरकारी): इसका मुख्य उद्देश्य जनसेवा और जनकल्याण होता है। यह पूरी तरह सरकारी कानूनों, नियमों और निरंतर सार्वजनिक व राजनीतिक नियंत्रण में काम करता है। इसमें वित्तीय मामलों में पारदर्शिता और एकरूपता अनिवार्य होती है।
  • निजी प्रशासन (प्राइवेट): इसका मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना (Profit Motive) होता है। यह निजी नियमों और बाजार की प्रतिस्पर्धा के आधार पर चलता है। इसमें निर्णय बहुत तेजी से लिए जाते हैं और यह जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं होता।

लोक प्रशासन की अध्ययन पद्धतियाँ (Methods of Study)

  • कानूनी/संस्थानिक पद्धति: इसमें प्रशासनिक संस्थाओं के कानूनी ढांचे और नियमों का अध्ययन किया जाता है।
  • ऐतिहासिक पद्धति: इसमें भूतकाल की प्रशासनिक व्यवस्थाओं और उनके क्रमिक विकास का अध्ययन किया जाता है।
  • व्यवहारवादी पद्धति: इसमें प्रशासन के भीतर काम करने वाले मनुष्यों के वास्तविक व्यवहार और उनके मनोविज्ञान का अध्ययन किया जाता है।
  • पारिस्थितिकीय पद्धति (Ecological Approach): एफ. डब्ल्यू. रिग्स द्वारा प्रतिपादित इस पद्धति के अनुसार, प्रशासन अपने आस-पास के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पर्यावरण से प्रभावित होता है।

2. केन्द्रीयकरण, विकेन्द्रीकरण तथा शक्ति का हस्तांतरण (Centralization & Decentralization)

  • केन्द्रीयकरण (Centralization): जब संगठन में निर्णय लेने, नीतियां बनाने और नियंत्रण रखने की सभी शक्तियां शीर्ष प्रबंधन या किसी एक केंद्रीय बिंदु (Center) पर केंद्रित होती हैं, तो उसे केन्द्रीयकरण कहते हैं। यह व्यवस्था अनुशासन और एकरूपता के लिए अच्छी है, लेकिन इसमें काम में देरी (लालफीताशाही) होती है।
  • विकेन्द्रीकरण (Decentralization): जब निर्णय लेने की शक्तियों को संगठन के निचले स्तरों या स्थानीय इकाइयों तक स्थायी रूप से विभाजित कर दिया जाता है, तो उसे विकेन्द्रीकरण कहते हैं। (जैसे भारत में 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज और नगर पालिकाओं की स्थापना)।
  • शक्ति का हस्तांतरण (Delegation of Power): जब कोई उच्च अधिकारी अपने काम के बोझ को कम करने के लिए अपनी कुछ शक्तियां या कार्य अस्थायी रूप से अपने अधीनस्थ (निचले) कर्मचारी को सौंपता है, तो उसे सत्ता का हस्तांतरण कहते हैं। इसमें अंतिम जिम्मेदारी हमेशा उच्च अधिकारी की ही रहती है।

3. कार्मिक प्रशासन और UPSC (Personnel Administration & UPSC)

कार्मिक प्रशासन का संबंध लोक सेवकों (सरकारी कर्मचारियों) के प्रबंधन से है, जिसके मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:

  • भर्ती (Recruitment): योग्य उम्मीदवारों को प्रशासनिक सेवाओं में आकर्षित करने की प्रक्रिया। भारत में सिविल सेवाओं के लिए योग्यता-आधारित खुली प्रतियोगिता परीक्षा प्रणाली अपनाई जाती है।
  • पदोन्नति (Promotion): कर्मचारियों के अच्छे कार्य और अनुभव के आधार पर उन्हें निचले पद से उच्च पद और अधिक जिम्मेदारियों पर भेजना। इसके दो मुख्य सिद्धांत हैं— वरिष्ठता (Seniority) और योग्यता (Merit)।
  • प्रशिक्षण (Training): नवनियुक्त लोक सेवकों के कौशल, कार्यक्षमता और दृष्टिकोण को सेवा के अनुकूल बनाने की प्रक्रिया (जैसे आईएएस के लिए लबासना, मसूरी में प्रशिक्षण)।
  • संघीय लोक सेवा आयोग (UPSC):
    • भारतीय संविधान के भाग XIV (अनुच्छेद 315-323) के तहत यह एक स्वतंत्र, संवैधानिक संस्था है।
    • कार्य: देश की केंद्रीय और अखिल भारतीय सेवाओं (जैसे IAS, IPS, IFS) के लिए निष्पक्ष परीक्षाओं का आयोजन करना और सिविल सेवकों की भर्ती व अनुशासनात्मक मामलों में सरकार को परामर्श देना।

4. वित्तीय प्रशासन और भारत में बजट प्रक्रिया (Financial Administration & Budget)

  • बजट का अर्थ: बजट एक वित्तीय वर्ष (भारत में 1 अप्रैल से 31 मार्च) में सरकार की अनुमानित प्राप्तियों (Income) और खर्चों (Expenditure) का एक विवरण पत्र होता है। संविधान के अनुच्छेद 112 में इसे ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ कहा गया है।
  • भारत में बजट निर्माण व पारित होने की प्रक्रिया:
    1. तैयारी (Preparation): वित्त मंत्रालय द्वारा विभिन्न मंत्रालयों और नीति आयोग के सहयोग से सितंबर-अक्टूबर से ही बजट बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
    2. प्रस्तुतीकरण (Presentation): राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी से वित्त मंत्री द्वारा बजट को लोकसभा में पेश किया जाता है, जहाँ वे बजट भाषण पढ़ते हैं।
    3. आम बहस (General Discussion): बजट पेश होने के बाद संसद के दोनों सदनों में बजट की नीतियों पर सामान्य चर्चा होती है।
    4. विभागीय समितियों द्वारा जांच: सदन कुछ समय के लिए स्थगित होता है और संसद की स्थायी समितियां विभिन्न मंत्रालयों की खर्च की मांगों की बारीकी से जांच करती हैं।
    5. अनुदान की मांगों पर मतदान (Voting on Demands for Grants): लोकसभा में प्रत्येक मंत्रालय के खर्च की मांगों पर बहस होती है और मतदान किया जाता है। (यह शक्ति केवल लोकसभा के पास है)।
    6. विनियोग विधेयक (Appropriation Bill): संविधान के अनुसार सरकार संचित निधि (Consolidated Fund) से तब तक धन नहीं निकाल सकती जब तक यह विधेयक पास न हो जाए। इसके पास होने के बाद ही सरकार को खर्च की अनुमति मिलती है।
    7. वित्त विधेयक (Finance Bill): इसमें नए टैक्स लगाने या पुराने टैक्स में बदलाव के प्रस्ताव होते हैं। इसके पास होने के बाद बजट प्रक्रिया पूरी होती है।

5. विकास प्रशासन और नौकरशाही (Development Administration & Bureaucracy)

  • विकास प्रशासन (Development Administration): यह शब्द एडवर्ड वाइडनर द्वारा लोकप्रिय बनाया गया। यह पारंपरिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले प्रशासन से अलग है। यह परिवर्तन-मुखी और लक्ष्य-मुखी (Change-oriented & Goal-oriented) होता है, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज का सामाजिक-आर्थिक विकास करना और गरीबी, अशिक्षा को दूर करना है।
  • नौकरशाही की प्रकृति एवं कार्य (Nature & Functions of Bureaucracy):
    • प्रकृति: मैक्स वेबर ने नौकरशाही का आदर्श मॉडल दिया था। इसकी प्रकृति स्थायी, वेतनभोगी, कुशल, निष्पक्ष और नियमों से बंधी (Rule-bound) होती है। भारतीय संदर्भ में इसे ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ के बजाय ‘तटस्थ नौकरशाही’ (राजनीतिक रूप से निष्पक्ष) होना चाहिए।
    • प्रमुख कार्य: व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों और कैबिनेट की नीतियों को पूरी निष्ठा से जमीन पर लागू करना, मंत्रियों को नीति निर्माण के समय आवश्यक डेटा और सलाह देना, और जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ जनता तक पहुँचाना।

6. लोकपाल एवं लोकायुक्त (Ombudsman: Lokpal & Lokayukta)

  • अवधारणा: यह स्वीडन के ‘ओम्बुड्समैन’ (Ombudsman) संस्था पर आधारित है, जिसका मुख्य कार्य सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग की शिकायतों की स्वतंत्र जांच करना है।
  • भारत में विकास: भारत में प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने सबसे पहले इसकी सिफारिश की थी। लंबे संघर्ष और अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 पारित हुआ।
  • लोकपाल (केंद्रीय स्तर पर): यह राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार की जांच करने वाली संस्था है। इसके अधिकार क्षेत्र में देश के प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद और ग्रुप ए, बी, सी, डी के अधिकारी आते हैं। इसमें एक अध्यक्ष और अधिकतम 8 सदस्य हो सकते हैं।
  • लोकायुक्त (राज्य स्तर पर): इसी अधिनियम के तहत राज्यों में लोकायुक्त संस्था का गठन किया जाता है, जो राज्य के मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करती है। (लोकायुक्त गठित करने वाला भारत का पहला राज्य महाराष्ट्र था)।

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